क्या आपके साथ भी ऐसा होता है?
पूरे दिन आप हर ग्राहक से "असुविधा के लिए माफ़ी चाहते हैं" कहते रहे और चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी, लेकिन घर लौटते हुए मेट्रो में बैठते ही चेहरे पर कोई भाव नहीं बचता। घर पहुँचकर कोई बात करना चाहे तो जवाब देने की ताकत नहीं रहती, और छोटी-छोटी बात पर चिड़चिड़ाहट होने लगती है। बाहर आप सबसे नरम और धैर्यवान इंसान हैं, इसलिए यह देखकर बुरा लगता है कि सबसे ज़्यादा रूखापन उन्हीं लोगों के साथ होता है जिन्हें आप सबसे ज़्यादा चाहते हैं।
आखिर हो क्या रहा है?
इमोशनल लेबर (emotional labor) का मतलब है कि आप असल में चाहे जो महसूस कर रहे हों, आपको वही भावनाएँ दिखानी पड़ती हैं जो आपका काम माँगता है। यह अवधारणा समाजशास्त्री आर्ली हॉक्सचाइल्ड के एयर होस्टेस पर किए गए अध्ययन से मशहूर हुई, और आज यह सिर्फ़ सर्विस सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉल सेंटर, अस्पताल, पढ़ाई, देखभाल के काम और कई दफ़्तरी नौकरियों पर भी लागू होती है।
शोधकर्ता आमतौर पर इसके दो तरीके बताते हैं। पहला है सरफ़ेस एक्टिंग (surface acting): अंदर की भावना जस की तस रहती है, सिर्फ़ चेहरे के भाव बदले जाते हैं। दूसरा है डीप एक्टिंग (deep acting): सामने वाले की जगह खुद को रखकर अपनी भावनाओं को सचमुच बदलने की कोशिश करना। कई अध्ययनों में एक बात बार-बार सामने आती है: आप जो महसूस करते हैं और जो दिखाते हैं, उनके बीच का फ़ासला जितना बड़ा होता है, यानी जितनी लंबी अवधि तक सरफ़ेस एक्टिंग पर निर्भर रहते हैं, भावनात्मक थकावट की संभावना उतनी बढ़ जाती है। इस फ़ासले को कभी-कभी इमोशनल डिसोनेंस भी कहा जाता है। और जब नियम हो कि "हमेशा खुश दिखो", जबकि बदतमीज़ी के सामने भी आपके पास कोई विकल्प न हो, तो बर्नआउट और जल्दी आता है।
दबाई गई भावनाएँ गायब नहीं होतीं, बल्कि कहीं न कहीं जमा होती रहती हैं। इसीलिए दफ़्तर में दबाया गया गुस्सा या दुख सबसे सुरक्षित लोगों, यानी परिवार और दोस्तों के सामने फूट पड़ता है। इसका मतलब यह नहीं कि आपका स्वभाव बुरा है। हो सकता है यह बस इस बात का संकेत हो कि पूरे दिन भावनाओं को संभालते-संभालते आपकी ऊर्जा खत्म हो गई है।
आज से आप क्या आज़मा सकते हैं
1. "काम वाले मैं" और "असली मैं" के बीच एक दरवाज़ा बनाएँ
छुट्टी के वक्त एक छोटी-सी रस्म तय करें। आईडी कार्ड को बैग में अंदर रख देना, या दफ़्तर की इमारत से निकलते हुए मन में कहना "आज का रोल खत्म", मन को मोड बदलने में मदद कर सकता है। कपड़े बदलना या हाथ धोना भी अच्छा संकेत बन सकता है।
2. भावना को नाम दें
किसी मुश्किल ग्राहक के बाद मन में अपनी भावना को ठीक-ठीक नाम दें: "अभी मुझे अपमानित और नाइंसाफ़ी का शिकार महसूस हो रहा है।" कुछ शोध बताते हैं कि भावना को सिर्फ़ नाम देने से भी उसकी तीव्रता थोड़ी कम हो सकती है। फ़ोन के नोट्स में एक शब्द लिख लेना काफ़ी है।
3. उनकी बातों को अपनी कीमत से अलग रखें
ग्राहक का गुस्सा अक्सर हालात या सिस्टम पर होता है, आप पर एक इंसान के रूप में नहीं। मन में दोहराएँ, "वे समस्या से नाराज़ हैं, मुझसे नहीं", तो चोट उतनी गहरी नहीं जाती। इसका मतलब बदतमीज़ी सहना नहीं है, बल्कि उन शब्दों को अपनी कीमत का फ़ैसला न मानने का अभ्यास है।
4. ऐसा आराम लें जिसमें भावनाएँ खर्च न हों
अगर छुट्टी के दिन भी सिर्फ़ ऐसे प्लान हैं जिनमें दूसरों का मूड संभालना पड़ता है, तो उबरने की जगह ही नहीं बचती। हफ़्ते में कुछ बार ऐसा समय ज़रूर रखें जब किसी के लिए मुस्कुराना न पड़े: अकेले टहलना, आराम से नहाना, पसंदीदा गाने सुनना। चेहरे की मांसपेशियों को भी आराम चाहिए।
5. साथ निभाने वाले लोग ढूँढें
वही काम करने वाले किसी साथी से बस इतना कहना कि "आज सच में बहुत भारी दिन था", बड़ी राहत दे सकता है। यह भी पता करें कि आपकी कंपनी में कर्मचारियों की सुरक्षा की कोई नीति, आराम की जगह, या बदसलूकी करने वाले ग्राहकों से निपटने की प्रक्रिया है या नहीं। ऐसा ढाँचा ढूँढना जिसमें आपको सब अकेले न उठाना पड़े, यह भी उबरने का हिस्सा है।
कब मदद लेनी चाहिए
अगर काम पर जाने के ख़याल से ही दिल तेज़ धड़कने लगे और सीना भारी हो जाए, या भावनाएँ इतनी सुन्न हो गई हों कि मुस्कान भी न आए, तो थकावट गहरी हो चुकी हो सकती है। अगर नींद नहीं आती, भूख बहुत बदल गई है, या बार-बार लगता है कि "सब कुछ छोड़ देना चाहता हूँ", तो डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या अपने इलाके की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से मदद लें। अगर आप संकट में हैं, तो तुरंत अपने स्थानीय आपातकालीन नंबर या संकट हेल्पलाइन से संपर्क करें।
अगर पूरा दिन आपने सबकी भावनाओं का ख़याल रखा है, तो अब आपकी बारी है। Mana के सामने आपको मुस्कुराने की ज़रूरत नहीं।