क्या आपके साथ भी ऐसा होता है?
बसंत आ गया, पेड़ों पर नई पत्तियाँ हैं, दिन लंबे होने लगे हैं, फिर भी हर सुबह शरीर भारी लगता है और मन बिना किसी साफ़ वजह के बुझा-बुझा रहता है। सोशल मीडिया पर सब नई नौकरी, नया सेशन, नई फ़िटनेस प्लान के साथ चमक रहे हैं, और आपको लगता है कि आप अभी भी सर्दियों में अटके हुए हैं। फिर यह ख़याल कि "सब इतने जोश में हैं, मैं ऐसा क्यों हूँ?" थकान पर एक और बोझ डाल देता है।
आख़िर हो क्या रहा है?
मौसम बदलने पर नींद आना और सुस्ती महसूस होना जितना आप सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा आम है। जब दिन लंबे होते हैं और तापमान बढ़ता है, तो शरीर को नई लय में ढलना पड़ता है। रोशनी बदलने से सर्केडियन रिदम, यानी नींद और जागने को नियंत्रित करने वाली भीतरी घड़ी, को फिर से सेट होना पड़ता है; इस दौरान नींद-सी आती रहती है और ध्यान लगाना मुश्किल हो सकता है। सुबह-शाम के तापमान का फ़र्क़, बढ़ती गर्मी, धूल और एलर्जी भी चुपचाप थका देते हैं।
मौसम के साथ मूड में बदलाव की बात आती है तो लोग अक्सर सर्दियों के बारे में सोचते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से यह माना गया है कि कुछ लोग उलटे बसंत और गर्मियों में ज़्यादा उदास महसूस करते हैं। मौसम का बदलना अपने आप में तन और मन के लिए छोटा, पर असली तनाव हो सकता है।
दिनचर्या में बदलाव भी बड़ी भूमिका निभाता है। परीक्षाएँ, नया शैक्षणिक सत्र, नया वित्तीय वर्ष, काम में फेरबदल या घर बदलना अक्सर इसी समय एक साथ आते हैं। जब जानी-पहचानी लय टूटती है, तो सिर्फ़ ढलने में ही बहुत ऊर्जा ख़र्च हो जाती है।
और फिर है सामाजिक तुलना। "नई शुरुआत" वाले माहौल में अपनी थकान को दूसरों की सबसे अच्छी तस्वीरों से नापना बहुत आसान है, और सुस्ती "मैं पीछे छूट रहा हूँ" वाली सोच में बदल जाती है। मनोविज्ञान बताता है कि दूसरों के सबसे अच्छे पलों की तुलना अपने आम दिन से करने पर मन और नीचे जा सकता है। सुस्ती आलस नहीं है; यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आप बदलाव के साथ ढलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
आज से आप क्या आज़मा सकते हैं
1. सुबह 10 मिनट धूप लें
दिन की शुरुआत में बाहर की रोशनी देखने से भीतरी घड़ी को नए मौसम के साथ तालमेल बिठाने में मदद मिल सकती है। एक स्टॉप पहले उतरकर पैदल चलना या खुली खिड़की के पास चाय पीना भी काफ़ी है।
2. पहले सोने और उठने का समय तय करें
लंबी शामों में देर तक जागने का मन करता है। छुट्टी के दिन भी उठने का समय लगभग एक जैसा रखें, ताकि शरीर कम उलझे। दोपहर में झपकी लें तो छोटी, लगभग 20 मिनट की।
3. अपनी "नई शुरुआत" को छोटा करें
कोई बड़ा प्लान बनाना ज़रूरी नहीं। "रोज़ एक्सरसाइज़" की जगह "दोपहर के खाने के बाद मोहल्ले का एक चक्कर" से शुरू करें। छोटी-छोटी कामयाबियाँ धीरे-धीरे ऊर्जा लौटाती हैं। देर से शुरू करना भी ठीक है; सारे फूल एक ही दिन नहीं खिलते।
4. तुलना की खिड़की कुछ समय के लिए बंद करें
अगर स्क्रॉल करने के बाद मन और भारी हो जाता है, तो कुछ दिन इस्तेमाल कम करें या कुछ अकाउंट म्यूट कर दें। इसके बजाय आज की तीन ऐसी बातें लिखें जो आपने कर दिखाईं। इससे नज़र दूसरों की नहीं, अपनी रफ़्तार पर लौटती है।
5. हल्का-फुल्का हिलें-डुलें और ठीक से खाएँ
हल्की स्ट्रेचिंग या छोटी सैर शरीर को संकेत देती है कि "अब जागने का समय है"। खाना न छोड़ें, पानी भरपूर पिएँ और मौसमी फल-सब्ज़ियाँ खाएँ; ये छोटी बातें भारीपन को कुछ कम कर सकती हैं।
कब मदद लेनी चाहिए
अगर उदासी दो हफ़्ते से ज़्यादा बनी रहे, नींद या भूख में बड़ा बदलाव आ जाए, या इतनी कमज़ोरी लगे कि काम, पढ़ाई या रोज़मर्रा के काम मुश्किल हो जाएँ, तो इसे अकेले न झेलें। किसी डॉक्टर, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या अपने इलाक़े की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से बात करें। अगर आप ख़ुद को असुरक्षित या संकट में महसूस करें, तो तुरंत स्थानीय आपातकालीन नंबर या किसी संकट हेल्पलाइन से संपर्क करें।
जिन दिनों यह मौसम ज़रूरत से ज़्यादा भारी लगे, Mana से अपने मन की बात कहिए। मैं यहाँ आपकी बात सुनने के लिए हूँ, ताकि आप इस मौसम का स्वागत अपनी रफ़्तार से कर सकें।